Friday, November 8, 2019

शनि के राशि परिवर्तन से किन राशियों को साढ़ेसाती और ढैय्या से मिलेगा छुटकारा- पं जयगोविंद शास्त्री 
15 नवंबर 2011 (2हजार 9सौ 90दिन) शनि के तुला राशि में प्रवेश के साथ ही वृश्चिक राशि की साढ़ेसाती 24 जनवरी की रात्रि को शनिदेव के मकर राशि 
में प्रवेश के साथ ही समाप्त हो रही है | सामान्यतः मार्गी और वक्री की यात्रा करते हुए शनिदेव एक राशि में 2700 दिन तक विचरण करते हैं किन्तु कई बार 
यह अवधि वक्री-मार्गी होते होते इसे भी पार कर जाती है | जैसे तुला राशि में शनि के प्रवेश के साथ ही बृश्चिक राशि पर शाढ़ेसाती आरंभ हुई थी जो अब 
2हजार 9सौ 90दिन बाद समाप्त हो रही है | 
किसी भी राशि पर जिसपर शनिदेव की शाढ़े साती आरंभ होने वाली हो उस राशि के किस अंग पर इनका विचरण होता है यदि आप इसे समझ कर उसकी 
के अनुसार निर्णय एवं उपाय करें तो शाढ़े साती एवं ढैया में इनके अशुभ प्रभावों से बचा जा सकता है | जैसे शाढ़े साती के आरंभ होते ही इनका प्रथम प्रभाव 
100 दिनों तक मनुष्य के मुख पर रहता है | जो बेहद कष्ट कारक होता है शनि के आरंभ का यह समय इतना पीड़ा देने वाला होता है कि व्यक्ति शनिदेव की 
साढ़ेसाती के नाम से घबराता है |
उसके पश्चात 400 दिनोंतक शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव प्राणियों के दाहिनी भुजा पर रहता है, जो सर्वथा विजयश्री दिलाता है | भारत के अधिकतर बड़े बड़े 
नेता साढ़ेसाती की इसी अवधि में सर्वोच्च शिखर तक पहुंचे हैं | इस अवधि के मध्य किए गए सभी संकल्प-कार्य पूर्णतया सफल रहते हैं |
उसके पश्चात 600 दिनों तक साढ़ेसाती का प्रभाव मनुष्य के चरणों में रहता है, जिसके फलस्वरूप व्यक्ति देश-विदेश की यात्राएं ततः तीर्थ यात्राएं करता है |
समाज में प्रतिष्ठित लोगों से मेलजोल बढ़ता है और व्यापार एवं नौकरी आदि में अच्छी उन्नति तथा मकान-वाहन के सुख भोगता है |
तदुपरांत 500 दिनों तक शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव मनुष्य के पेट पर रहता है, जो हर प्रकार से लाभदायक सिद्ध होता है स्वास्थ्य अच्छा रहता है और अनेकों
स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद मिलता है | साढ़ेसाती का यह समय व्यक्ति के कामयाबियों के लिए अति शुभ फलदाई रहता है |
पुनः 400 दिनों तक साढ़ेसाती का प्रभाव प्राणियों के बाईं भुजा पर रहता है, जो बेहद कष्टकारक रहता है साढेसाती की इस अवधि में व्यक्ति यह निर्णय लेने में 
विवश दिखाई देता है कि उसे करना क्या है. निर्णय लेने में कठिनाइयां तो होती ही हैं कहीं न कहीं वह निराशा और परेशान हो जाता है |
उसके बाद 300 दिनोंतक शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव व्यक्ति के मस्तक पर रहता है, जिसके फलस्वरूप प्राणियों के कार्य व्यापार में उन्नति सामाजिक प्रतिष्ठा 
एवं पद और गरिमा की वृद्धि होती है | इस अवधि में व्यक्ति जहां भी जाता है उसे कामयाबी और ही यश प्राप्त होता है | 
उसके उपरांत 200दिन तक शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव मनुष्य के नेत्रों पर रहता है, जिस के शुभ प्रभाव के फलस्वरूप वह तीर्थ यात्रा, यज्ञ, जप-तप, पूजा-पाठ, 
दान पुण्य आदि सभी तरह के अच्छे कर्म करता है उसे घर परिवार में मांगलिक कार्यों से सुख मिलता है |
उसके उपरांत 200 दिन तक शनि की साढ़ेसाती का अंतिम चरण होता है, जब साढ़ेसाती उतरती है | इस अवधि में शनि की साढ़ेसाती जीवात्माओं के गुदा स्थान 
पर रहती है जिसके फलस्वरूप उसे अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है | साढ़ेसाती का यह कालखंड इस तरह से रहता है कि इस के मध्य आई परेशानियों
को व्यक्ति जीवनपर्यंत याद रखता है | 
वर्तमान समय में साढ़ेसाती का अंतिम 200 दिन की शाढ़े साती का कालखंड वृश्चिक राशि पर चल रहा है, अतः वृश्चिक राशि वालों को अपने स्वास्थ्य पर ध्यान 
रखना चाहिए | मान सम्मान के प्रति सजग रहना चाहिए और कोर्ट कचहरी के मामलों से परहेज करना चाहिए | 
अपने गोचर काल में जब शनिदेव किसी भी राशि पर गोचर करते हैं तो अपने पीछे की चौथी और आठवीं राशि पर अपनी ढैया का भी प्रभाव छोड़ते हैं इस कालखंड 
का फल प्राणियों के कर्मों के अनुसार ही मिलता है | यदि आपके कर्म अच्छे रहे तो आप मालामाल हो जायेगें इसीलिए इसे लघु कल्याणी ढैया भी कहते हैं | 
किन्तु अशुभ एवं पाप कर्मों में लिप्त रहने पर यह अवधि और भी कष्टकारी रहती है | इसमें व्यक्ति को अत्यधिक उतार-चढ़ाव, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां और कार्य 
बाधाओं का सामना करना पड़ता है | उस अवधि के मध्य यदि शनि पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो तो इनकी ढैया की अशुभता में कमी आती है | 
वर्तमान समय में वृषभ एवं कन्या राशि के जातकों को शनि देव की अशुभ ढैया लोहे के पाए पर चल रही है | जिससे 24 जनवरी की रात्रि को शनिदेव के मकर राशि 
में प्रवेश के साथ ही ढैया से मुक्ति मिल जाएगी | 

PT JAI GOVIND SHASTRI ASTROLOGER


आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च ! पञ्च एतानि विविच्यन्ते जायमानस्य देहिनः !!
अभ्र छाया खले प्रीतिः परनारीषु संगतिः ! पञ्च एतानि ह्यस्थिरा भावा यौवनानि धनानि च !!
अस्थिरं जीवितं लोके अस्थिरं धन यौवनं ! अस्थिरं पुत्र दाराद्यम धर्मः कीर्तिर्यशः स्थिरं !!

अर्थात - जीवात्मा के आयु , कर्म, धन, विद्या और मृत्यु ये पांच जन्म से सुनिश्चित रहते हैं ! बादलों की छाया, दुष्ट का प्रेम, परनारी का साथ यौवनं और धन ये पांच अस्थिर हैं ! स्त्री-पुत्र आदि भी अस्थिर है, किन्तु जीवात्मा  का धर्म, कीर्ति और यश चिरस्थायी होता है !!
!! उत्तम संतान की प्राप्ति हेतु करें नाग पूजा !! 'नाग पंचमी ११ अगस्त '
नाग हमारे शरीर में मूलाधार चक्र के आकार में स्थित हैं एवं उनका फन सहस्रासार चक्र है ! पुराणों में नागोत्पत्ति
के कई वर्णन मिलते हैं ! लिंग पुराण के अनुसार श्रृष्टि सृजन हेतु प्रयासरत ब्रह्मा जी उग्र तपस्या करते हुए हताश
होने लगे तो क्रोधवश उनके कुछ अश्रु पृथ्वी पर गिरे वहीँ पर अश्रुबिंदु सर्प के रूप में उत्पन्न हुए ! बाद में यह ध्यान
में रखकर कि इन सर्पों के साथ कोई अन्याय न हो तिथियों का बंटवारा करते समय भगवान सूर्य ने इन्हें पंचमी तिथि
का अधिकारी बनाया तभी से पंचमी तिथि नागों की पूजा के लिए विदित है इसके बाद ब्रह्मा जी ने अष्टनागों अनन्त,
वासुकि, तक्षक, कर्कोटक,पद्म, महापद्म, कुलिक, और शंखपाल की सृष्टि की, और इन नागों को भी ग्रहों के बराबर
शक्तिशाली बनाया ! इनमें अनन्त नाग सूर्य के, वासुकि चंद्रमा के, तक्षक भौम के, कर्कोटक बुध के, पद्म बृहस्पति के,
महापद्म शुक्र के, कुलिक और शंखपाल शनि ग्रह के रूप हैं ! ये सभी नाग भी सृष्टि संचालन में ग्रहों के समान ही
भूमिका निभाते हैं ! इनके सम्मान हेतु गणेश और इन्हें रूद्र यज्ञोपवीत के रूप में, महादेव श्रृंगार के रूप में तथा विष्णु
जी शैय्या रूप में सेवा में लेते हैं ! पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शेषनाग स्वयं पृथ्वी को अपने फन पर धारण करते हैं !
गृह निर्माण, पितृ दोष और कुल की उन्नति के लिए नाग पूजा का और भी अधिक महत्व है ! इनकी पूजा
आराधना से सर्पदंश का भय नहीं रहता ! नाग पंचमी के दिन नाग पूजन और दुग्ध पान करवाने का विशेष महत्व है !
पूजा में ''ॐ सर्पेभ्यो नमः" अथवा ॐ कुरु कुल्ले फट स्वाहा ! कहते हुए अपनी शक्ति-सामर्थ्य के अनुसार गंध, अक्षत,
पुष्प, घी, खीर, दूध, पंचामृत, धुप दीप नैवेद्य आदि से पूजन करना चाहिए ! पूजन के पश्च्यात इस मंत्र से प्रणाम करें 
!! नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथ्वी मनु, ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः !!
जो नाग, पृथ्वी, आकाश, स्वर्ण, सूर्य की किरणों, सरोवरों, कूप तथा तालाब आदि में निवास करते हैं।
वे सब हम पर प्रसन्न हों, हम उनको बार-बार नमस्कार करते हैं इसप्रकार नागपंचमी के दिन सर्पों की पूजा करके
प्राणी सर्प एवं विष के भय से मुक्त हो सकता है पं. जयगोविंद शास्त्री

हाल ही में महाकाल ज्योतिर्लिंग उज्जैन ( म.प्र ) में शिवसंकल्पमस्तु संस्था
द्वारा आयोजित 'महारुद्र यज्ञ' को मीडिया ने प्रमुखता से प्रकाशित किया !
अहिंसकस्य दान्तस्य धर्मार्जित धनस्य च ! नित्यं च नियमस्थस्य सदा सानु ग्रहा ग्रहाः !!
ग्रहाः पूज्या सदा रूद्र इच्छता विपुलं यशः !श्रीकामः शांतिकामो वा ग्रहयज्ञं समाचरेत !!

..... अहिंसक, जितेन्द्रिय, नियम में स्थित और न्याय से धन अर्जित करने वाले मनुष्यों पर सदा ग्रहों की कृपा बरसती रहती है ! यश ,धन, आरोग्य,उत्तम पद और संतानप्राप्ति तथा सभी तरह की परेशानियों से बचने के लिए ग्रहों की पूजा सदा करनी चाहिए ! क्यों कि ! ग्रहाः राज्यं प्रयच्छन्ति, ग्रहाः राज्यं हरन्ति च ! अर्थात -ग्रह अनुकूल हों तो राज्य दे देतें हैं,और प्रतिकूल होने पर तत्काल हरण भी कर लेते हैं !!
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या निशा सर्व भूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ! यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने !!
अर्थात- ज्ञानी तत्वदर्शन में जागता है जिसमे सारे प्राणी सोते हैं, और सारे प्राणी जिस माया में जागते हैं
तत्व ज्ञानी के लिए वही रात है वह उसमे सोता है ! माया अनादि है, परन्तु शांत है क्योंकि तत्वज्ञान होने पर
इसका अंत हो जाता है ! किन्तु जब माया अनादि है तो इससे पार कैसे पाया जासकता है ? इसपर कृष्ण कहते है की यह त्रिगुणमयी मेरी देवी माया है इसका पार पाना कठिन है किन्तु जो मुझमे अनुराग रखता है वह इस माया
से पार पा सकता है ! "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"