अधोगति से मुक्ति देने वाली एकादशी आज
सनातन धर्मावलम्बी संन्यासी तथा वैष्णवजन नारायणस्वरूपिणी सभी एकादशियों का व्रत-पूजन बड़े श्रद्धा-विश्वाश के साथ करते हैं | सभी शास्त्रों का एक ही मत है कि, एकादशी का व्रत करने वाला प्राणी गोलोक को जाता है उसे नरक यातना का ताप नहीं सहना पड़ता | इनमें वर्ष पर्यन्त कुल चौबीस एकादशियाँ होतीं हैं | इतनी बार प्राणी को अधोगति से बचकर वैष्णवलोक जाने का अवसर मिलता है | जिस वर्ष मलमास अथवा अधिकमास लग जाता है उस वर्ष 'पुरुषोत्तमी' नामक दो एकादशी और बढ़ जाती हैं जिनसे इनकी कुल संख्या छब्बीस हो जाती है | इन सभी में श्रीहरि की ही तरह वरदान देने की पूर्णक्षमता है | माघ शुक्लपक्ष की एकादशी (जया एकादशी) का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि इनका व्रत-पूजन करने से प्राणियों को पिशाच योनि जैसी अधोगति की यतना नहीं सहनी पड़ती | धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण कहते हैं कि- माघ माह शुक्लपक्ष की एकादशी बहुत ही पुण्यदायी है, इस एकादशी का व्रत करने से प्राणी ब्रह्म हत्या जैसे महापाप तथा भूत, प्रेत, पिशाच आदि जैसी योनि से मुक्त हो जाता है |
पदम् पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशी तिथि का महत्त्व समझाते हुए कहा है कि बड़े-बड़े यज्ञों से भी मुझे उतनी प्रसन्नता नहीं मिलती जितनी एकादशी व्रत के अनुष्ठान से मिलती है | यह तिथि मनुष्य के लिए परम कल्याणकारी है अतः सर्वथा प्रयत्न करके यह व्रत करना चाहिए | जया एकादशी सब पापों का नाश करने वाली उत्तम तिथि है | शास्त्रों में जया एकादशी के विषय में कहा गया है कि जिसने 'जया' का व्रत किया है उसने सब प्रकार के दान दे दिए और उसने सम्पूर्ण यज्ञों का अनुष्ठान कर लिया |
इसदिन व्रती को भगवान श्रीहरि की पूजा के समय श्रीविष्णु सहस्त्रनाम, पुरुषसूक्त का पाठ करना चाहिए | अधिक मंत्र आदि न आता हो तो सहज भाव से ये महामन्त्र- 'ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने | प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः || और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र से आवाहन, आसन, अर्घ्य, स्नान आदि कराकर रोली, मोली, चन्दन, अक्षत, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य ऋतुफल, आदि अर्पित करके श्री हरि की आरती करना चाहिए | व्रती को पूरेदिन परनिंदा, छल-कपट, लालच, द्धेषपूर्ण भावनाओं से दूर रहकर श्री नारायण का भजन-कीर्तन करना चाहिए | द्वादशी के दिन ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करें |
पौराणिक कथा-
जया एकादशी के विषय में यह पौराणिक कथा प्रसिद्ध है कि, एक समय माल्यवान नामक गन्धर्व और पुष्पवन्ती नाम की अप्सरा का इंद्र की सभा में गान हो रहा था | परस्पर अनुराग के कारण दोनों एक-दुसरे के मोह के वशीभूत हो गए व इनके चित्त में भ्रान्ति आ गयी और सुर-ताल को बराबर न रख सके | इंद्र ने इसमें अपना अपमान समझा और कुपित होकर दोनों को पति-पत्नी के रूप में रहते हुए पिशाच हो जाने का श्राप दे दिया | पिशाच योनि को पाकर दोनों हिमालय पर्वत पर भयंकर दुःख भोगने लगे | दैवयोग से जया एकादशी के दिन दोनों ने सब प्रकार का आहार त्यागकर पीपल वृक्ष के निकट बैठकर बिताई | द्वादशी के दिन उनके द्वारा 'जया' नामक उत्तम व्रत का पालन हो गया | उस व्रत के प्रभाव से उन्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल गई और वे दोनों पुनःअपना दिव्यरूप प्राप्त कर स्वर्ग चले गए |






