शुक्रवार, 4 जुलाई 2014


'देवताओं की तपस्या का पावन पर्व है, 'चातुर्मास्य'
ऋषियों, मुनियों, योगियों, यक्षों, गंधर्वो, नागों, किन्नरों एवं देवताओं आदि की तपस्या का पावन पर्व 'चातुर्मास्य' आषाढ़ शुक्ल एकादशी 09 जुलाई बुधवार
से आरम्भ हो रहा है, भगवान श्रीहरि के योगनिद्रा में प्रवृत्त हो जाने के साथ ही तपस्या का यह पर्व आरंभ होगा, जो कार्तिक शुक्ल एकादशी (हरिप्रबोधिनी)
03 नवम्बर तक चलेगा | इस मध्य भगवान विष्णु का शयन काल रहेगा जिसके परिणाम स्वरूप देव शक्तियां क्षीण होती जायेगी | इस व्रत को गृहस्तवर्ग
भी कर सकते है | देवर्षि नारद के पूछने पर भगवान शिव ने इस व्रत की विधि और महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि देवर्षि ! इस अवधि के मध्य
न तो घर में या मंदिर में मूर्ति आदि स्थापना/प्राणप्रतिष्ठा होती है न ही विवाह आदि यज्ञोपवीत आदि कर्म होते है इस व्रत को करने से प्राणी संसार के सभी
भोगों ऐश्वर्यों को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है उसके लिए कुछ भी पाना श्रेष्ठ नहीं रह जाता ! आराधना की बिधि इसप्रकार है कि गृहस्त अपने घर
में चतुर्भुज श्रीविष्णु की प्रतिमा स्थापित करे ! प्रतिमा को पीताम्बर पहनाएं, उसे शुद्ध एवं सुंदर पलंगपर, जिसके ऊपर सफेद चादर बिछी हो और तकिया रखी
हो, स्थापित करे | फिर दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, शर्करा, लावा और गंगाजल से स्नान कराकर उत्तम गोपी चन्दन का लेप करें पुनः गंगा जलसे स्नान
कराकर गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, ऋतुफल, पुष्प, सुगन्धित पदार्थों से श्रृंगार करे ! इस प्रकार श्रीहरि की पूजा करके इस मंत्र से प्रार्थना करे !
सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम् | विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत्सर्वं चराचरम् || अर्थात हे ! जगदीश्वर ! जगन्नाथ ! आपके सो जानेपर यह सारा
जगत् सो जाता है तथा आपके जागृत होने पर सम्पूर्ण चराचर जगत् जग उठता है | इस प्रकार भगवान विष्णु की प्रार्थना करे और ॐ नमो नारायण' का जप
प्रतिदिन इन्हीं ध्यान मंत्र से पूजन जप करे ऐसा करने से नारायण उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करदेते हैं | वेदों में भी कहा गया है कि अहिंसा श्रेष्ठ धर्म है
इसलिए जीव हत्या न करे, वाणी पर संयम रखे ! व्रत के मध्य गुड़ छाछ दही दूध आदि के सेवन से बचे किन्तु बाल बृद्ध एवं रोगियों के लिए यह परहेज
मान्य नही होगा ! कार्तिक शुक्ल एकादशी को व्रत समाप्ति हेतु उद्यापन कर ब्राह्मण भोजन दानपुण्य करके प्राणी समस्त भवबंधनों से मुक्त होकर श्रीविष्णु
लोक वासी होता है ! पं जयगोविंद शास्त्री

बुधवार, 2 जुलाई 2014

!! सकारात्मक सोच ही व्यक्ति की सफलता की कुंजी होती है !!

सोमवार, 30 जून 2014


सृष्टि उस विराट चेतनाशक्ति की अभिव्यक्ति मात्र है ! धर्म उस चेतना
को उपलब्ध होने वाला विज्ञान है ! संन्यास और वैराग्य इसका आरम्भ
है तथा मुक्ति अंत ! यह जीव की अंतिम स्थिति है, 'शिवसंकल्पमस्तु'

रविवार, 29 जून 2014

ममैवांशे जीवलोके जीवभूतः सनातनः !

प्राणियों में जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है ! अतः जो मुझे 
भजता है वही मुझे प्राप्त करता है, यह राधेगोविंद का वचन है

शनिवार, 28 जून 2014


हे ! परमेश्वर ! परमपिता ! मोहरूपी अंधकार को दूर करने वाले पतितोत्धारक,
अपनी ज्योतियों की ज्योति ज्ञानज्योति से आत्मज्ञान का सत्यपथ आलोकित
करके हमें अमृतमय मोक्ष प्रदान कीजिये !

शुक्रवार, 27 जून 2014


शक्ति आराधना का पर्व 'गुप्त नवरात्र'
पुरुषार्थ चतुष्टय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाली दस महाविद्याओं की आराधना का पर्व 'गुप्त नवरात्र' कल से आरंभ हो रहे हैं पालनहार
श्री विष्णु के शयन काल की अवधि आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी के मध्य जब देव प्राण क्षीण हो जायेंगें और पृथ्वी पर रूद्र, वरुण, यम
आदि के द्वारा नाना प्रकार के रोग, बाढ़ सुखा आदि का प्रकोप रहेगा तो इन संभावित विपत्तियों से बचाव के लिए गुप्त नवरात्र में माँ दुर्गा की उपासना की जाती
है शास्त्रों के अनुसार सतयुग में चैत्र शुक्लपक्षीय नवरात्र, त्रेता में आषाढ़ शुक्लपक्षीय नवरात्र, द्वापर में माघ शुक्लपक्षीय और कलयुग में आश्विन शुक्लपक्षीय
यानी शारदीय नवरात्र में माँ शक्ति की साधना-उपासना का विशेष महत्व रहता है, यह नवरात्र आषाढ़ शुक्लपक्ष प्रतिपदा से नवमी तक रहता है दशमी के दिन
पारणा होती है और एकादशी को यज्ञदेव श्री विष्णु चार माह के लिए क्षीरसागर में शयन के लिए जाते हैं ! मार्कंडेय पुराण में उक्त चारों नवरात्रों में
शक्ति की आराधना के साथ-साथ अपने ईष्ट आराधना का भी विशेष महत्व बताया गया है ! घर में वास्तुदोष हो, पारिवारिक कलह हो, वंशवृद्धि अथवा संतान
प्राप्ति में बाधा आ रही हो शत्रुओं द्वारा प्रताणना हो रही हो, कोर्ट कचहरी के मामलों का भय हो या किसी भी तरह की नकारात्मक ऊर्जा का भय सता रहा हो
तो ऐसे समय माँ दुर्गा की आराधना गुप्तरूप से की जाती है इस नवरात्र में साधक को अपनी समस्त योजनाएं एवं पूजा संबंधी बिधि तथा मंत्र आदि गुप्त रखने
चाहिये ! विद्यार्थी वर्ग के लिए इसकाल में मां सरस्वती की आराधना भी विशेष फलदायी रहती है ।
शिवपुराण के अनुसार पूर्वकाल में 'रुरु' नामक महाबली दैत्य के पुत्र दुर्ग ने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करके वरदान स्वरुप चारों वेद प्राप्त किया जिसके
परिणाम स्वरुप वह अजेय होकर उपद्रव करने लगा ! उस समय वेदों के नष्ट हो जाने से देवता एवं ब्राह्मण पथभ्रष्ट होगये और जप-तप, दान, यज्ञ का भाव होने
लगा जिससे पृथ्वी पर वर्षों तक अनावृष्टि रही ! सभी देवता माँ पराम्बा की शरण में गए और माँ से पृथ्वी की सारी विपत्तियों के निदान का निवेदन किया कि,
माँ उस 'दुर्ग' नामक महादैत्य का वध करो ! देवताओं के स्तवन से माँ प्रसन्न होकर उस दुर्ग नामक महादैत्य के वध का संकल्प लिया और अपने शरीर से काली,
तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बागला, धूमावती, त्रिपुरसुंदरी और मातंगी नाम वाली दस महाविद्याओं को प्रकट किया और महादैत्य दुर्ग की
सौ अक्षौहिणी सेना नष्ट करके अपने त्रिशूल द्वारा उस दुर्ग नामक महादैत्य का विनाश कर देवताओ को भय मुक्त किया जिसने फलस्वरूप  इनका
नाम 'दुर्गा' पड़ा |तभी से उपरोक्त दस महाविद्याओं की साधना का पर्व 'गुप्त नवरात्र' के रूप में मनाया जाने लगा ! 28 जून से 07 जुलाई तक चलने वाले इस
नवरात्र में यदि आप स्नान ध्यान करके एकांत में शुद्ध आसन पर विराजते हुए केवल ॐ दुं दुर्गायै नमः मंत्र का जप करेंगें तो मंत्र के प्रभाव से आपकी समस्त
परेशानियाँ नष्ट हो जायेंगी ! पं जयगोविंद शास्त्री

शुक्रवार, 20 जून 2014

!! शिव के तांडव के बाद भी छाया रहेगा यात्रियों का उत्साह केदारनाथ यात्रा !!