ग्रहों के समान ही शक्तिशाली हैं नाग, नागपंचमी पर्व पर अमर उजाला समाचार पत्र में प्रकाशित मेरा आलेख
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गुरुवार, 12 अगस्त 2021
गुरुवार, 1 अप्रैल 2021
कठोपनिषद्
सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्नलिप्यते चाक्षुषैर्बह्यिदोषैः |
एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ||
स्रोत- कठोपनिषद्
संकेत-
प्रस्तुत मंत्र कठोपनिषद् द्वितीय अध्याय के द्वितीया वल्ली से लिया गया है |
मंत्र के द्वारा दुर्विज्ञेय ब्रह्मतत्वका प्रकारान्तर से जानने के क्रम में जगतात्मा
सूर्य को लेकर ब्रह्मनिरूपण किया गया है जिसमें आत्मा की असंगता के विषय
में बताया गया है कि अंतरात्मा केवल दृष्टा है वह संसार के बाह्य भोगों से दूर
ही रहता है, उसमें लिप्त नहीं होता |
मंत्रार्थ-
जिसप्रकार सम्पूर्ण लोकों का नेत्र होकर भी सूर्य नेत्रसंबंधी बाह्यदोषों से लिप्त नहीं होता उसी
प्रकार सम्पूर्ण भूतों का एक ही अन्तरात्मा संसार के दुःख से लिप्त नहीं होता, बल्कि उससे
बाहर ही रहता है वह दृष्टा मात्र है |
तात्पर्य-
जिसप्रकार सूर्य अपने प्रकाश से लोक का उपकार करता हुआ अर्थात मल-मूत्र आदि अपवित्र वस्तुओं
को प्रकाशित करने के कारण उन्हें देखने वाले समस्त लोकों का नेत्ररूप होकर भी अपवित्र पदार्थादिके
देखने से प्राप्त हुए आध्यात्मिक पापदोष तथा अपवित्र संसर्ग से होने वाले बाह्यदोषों से लिप्त नहीं
होता, उसीप्रकार सम्पूर्ण भूतों का एक ही अंतरात्मा लोक के दुःख से लिप्त नहीं होता, बल्कि उससे
बाहर ही रहता है | संसारी अपने आत्मा में आरोपित अविद्या के कारण ही कामना और कर्म जनित
दुखों का अनुभव करता है |
तैत्तिरीयोपनिषद्
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् | अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते |
अन्नेन जातानि जीवन्ति | अन्नं प्रयन्त्यभिसं विशन्तीति | तद्विज्ञाय
पुनरेव वरुणं पितरमुपससार | अधीहि भगवो ब्रह्मेति | तं होवाच | तपसा
ब्रह्म विजिज्ञासस्व | तपो ब्रह्मेति | स तपोऽतप्यत | स तपस्तप्त्वा ||
स्रोत- तैत्त्रियोपनिषद्
संकेत-
प्रस्तुत मंत्र तैत्त्रियोपनिषद् भृगुवल्ली के द्वितीय अनुवाक से लिया गया है | मंत्र के
द्वारा बताया गया है कि भृगु अपने पिता वरुण के पास गए और 'ब्रह्मविद्याविषयक'
प्रश्न किया, तथा 'अन्न ही ब्रह्म है' ऐसा जानलेने के पश्च्यात भी संशयग्रस्त होनेपर
पुनः उन्हींके उपदेश से तप करने के लिए प्रस्थान किए, इसका संकेत किया गया है |
मंत्रार्थ-
अन्न ही ब्रह्म है क्योंकि अन्न से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं | उत्पन्न होने पर अन्न
से ही जीवित रहते हैं तथा महाप्रयाण करते समय भी अन्न में ही लीन होते हैं | ऐसा
जानकर भी भृगु पुनः अपने पिता वरुण के पास आये और निवेदन किया कि भगवन ! मुझे
ब्रह्म का उपदेश कीजिये | वरुण ने कहा पुत्र ! ब्रह्म को तप के द्वारा जानने की इच्छा
करो, तप ही ब्रह्म है ! तब भृगु ने तपके लिए प्रस्थान किया |
तात्पर्य-
अन्न ही ब्रह्म हैं क्योंकि अन्न में ही प्राण प्रतिष्ठित रहते हैं | यह सृष्टि अन्न के बगैर
संभव नहीं | अन्न के द्वारा ही प्राणी जन्म लेता है | अन्न से ही जीवित भी रहता है |
अन्न के द्वारा ही यज्ञ संभव है | मृत्युपश्च्यात प्राणी अन्न में ही लीन हो जाता है |
यह अन्न ही ब्रह्म है, ऐसा जान लेने के बाद भी भृगु संशयग्रस्त होकर अपने पिता
वरुण के पास आये और 'ब्रह्मविद्याविषयक' ज्ञान के लिए पुनः निवेदन किया |
गुरुवार, 18 मार्च 2021
प्रश्नोपनिषद् 'ब्राह्मणभाग'
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः |
क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ||
स्रोत- प्रश्नोपनिषद् 'ब्राह्मणभाग'
संकेत:
प्रस्तुत मंत्र अथर्ववेदीय प्रश्नोपनिषद् 'ब्राह्मणभाग' के पंचमप्रश्न से लिया गया है जिसमें शिबिपुत्र
सत्यकाम के द्वारा महामुनि पिप्पलाद से प्रश्न किया गया है कि भगवन ! 'अक्षर ब्रह्म' ओंकार
की तीनों मात्राओं 'अकार, उकार तथा मकार की विशेषता क्या है ? इनकी उपासना से क्या फल
मिलता है |
मंत्रार्थ:
ओंकार की तीनों मात्राएँ पृथक पृथक रहने पर मृत्युसे युक्त हैं तभी इन्हें मृत्युमती भी कहा गया है |
वै ध्यान क्रिया में प्रयुक्त होती हैं और परस्पर सम्बद्ध तथा अनविप्रयुक्ता (जिनका विपरीत प्रयोग
न किया गया हो ऐसे) हैं | इस प्रकार बाह्य (जाग्रत) आभ्यंतर (सुषुप्ति) और मध्यम (स्वप्नस्थानीय)
क्रियाओं में उनका सम्यक प्रयोग किया जाने पर ज्ञाता पुरुष विचलित नहीं होता |
तात्पर्य:
अक्षर ब्रह्म ओंकार में प्रयुक्त होने वाली तीनों मात्राएँ 'अकार, उकार और मकार' मृत्यु से परे नहीं हैं |
इनकी भी मृत्यु होती है | वै आत्मा की ध्यानक्रियाओं में प्रयुक्त होती हैं और एक दुसरे से सम्बद्ध हैं
इसीलिए उन्हें 'अनविप्रयुक्ता' कहा गया है | बाह्य, आभ्यंतर और मध्यम तीन क्रियाओं में योगी
(ओंकार की मात्राओं के विभाग को जानने वाला साधक) विचलित नहीं होता क्योंकि, सर्वात्मभूत
और ओंकारस्वरूपता को प्राप्त हुआ विद्वान् विषयासक्त से परे है |
कठोपनिषद्
पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात् पराङ्पश्यति नान्तरात्मन् |
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मान मैक्षदावृत्तचक्षुर मृतत्वमिच्छन् ||
पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् |
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ||
स्रोत- कठोपनिषद्
संकेत-
प्रस्तुत मंत्र कठोपनिषद् के द्वितीय अध्याय की प्रथमा वल्ली से लिया गया है | मंत्र के द्वारा यमदेव
जी वाजश्रवस के पुत्र नचिकेता को आत्मज्ञान के मार्ग में आने वाली बाधाओं तथा विवेकी और अविवेकी
में क्या अन्तर होता है इसका ज्ञानामृत पिला रहे हैं |
मंत्रार्थ-
परब्रह्म परमेश्वर ने चक्षुरादि सभी इन्द्रियों को बहिर्मुखी प्रवृत्ति वाला बनाया है, जिसके द्वारा जीव
बाह्यबिषयों को ही देख पाता है, अन्तरात्माको नहीं | जिसने अमरत्व की इच्छा करते हुए अपनी
इन्द्रियों को वशीभूत कर लिया हो, ऐसा धीरपुरुष ही आत्मसाक्षात्कार कर पाता है | अल्पज्ञपुरुष
बाह्यभोगों के पीछे लगे रहते हैं तभी वै मृत्युके सर्वत्र फैले हुए पाश में पड़ते हैं | किन्तु विवेकी
पुरुष अमरत्वको परमसत्य जानकर संसारके अनित्य पदार्थोंमेंसे किसी की भी इच्छा नहीं करते |
तात्पर्य-
जो इन्द्रियाँ बहिर्मुख होकर ही शब्दादि विषयों को प्रकाशित करने के लिए प्रवृत हुआ करती हैं |
वै इन्द्रियाँ स्वभाव से ही ऐसी हैं इसलिए उनका हनन कर दिया गया है | इनका हनन करने
वाला परब्रह्म परमेश्वर स्वतः ही सर्वदा स्वतंत्र रहता है | अविवेकी पुरुष काम्यविषयों के पीछे
लगे रहते हुए निरंतर जन्म-मरण, जरा और रोग आदि बहुत से अनर्थसमूह को प्राप्त होते हैं |
ब्रह्मवेत्ता लोग इस अनर्थप्राय संसार के सम्पूर्ण अनित्य पदार्थों में से किसी की भी अभिलाषा
नहीं करते क्योंकि वै सब तो परमात्मा प्राप्ति के मार्ग की बाधाएं हैं |
माण्डूक्योपनिषद्
ओंकारं पादशो विद्यात्पादा मात्रा न संशयः | ओंकारं पादशो ज्ञात्वा न किंचदपि चिन्तयेत् |
युञ्जीत प्रणवे चेतः प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् | प्रणवे नित्ययुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ||
स्रोत- माण्डूक्योपनिषद्
संकेत-
प्रस्तुत मंत्र माण्डूक्योपनिषद् के प्रथम अध्याय से लिया गया है जिसमें समस्त ब्रह्मांड में निर्भयब्रह्म 'ॐ' की व्यापकता
और उसी की साधना करने का संकेत किया गया है | ओंकारोपासना के पश्च्यात पुनः किसी उपासना की आवश्यकता नहीं रहती | वह आत्मा अक्षरदृष्टि से ओंकार ही है | पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है, वै मात्रा अकार, उकार और मकार हैं |
मंत्रार्थ-
ओंकार को एक-एक पाद करके जाने; पाद ही मात्राएँ हैं इसमें संदेह नहीं | इसप्रकार ओंकार को पाद्क्रम से जानकर कुछ भी चिंतन न करें | चित्त को ओंकार में समाहित करे; ओंकार निर्भय ब्रह्मपद है | ओंकारमें नित्य समाहित रहने वाले पुरुषको कहीं भी भय नहीं होता |
तात्पर्य-
निर्भयब्रह्म 'ॐ' को ही प्रणव कहते हैं इनमें पाद ही मात्राएँ हैं और मात्राएँ ही पाद हैं | उस परमार्थस्वरूप ओंकार में ही चित्त को समाहित करे, क्योंकि ओंकार ही निर्भय ब्रह्म है | उसमें नित्य समाहित रहने वाले पुरुषको कहीं भी भय नहीं होता, वह परमज्ञानी हो जाता है और ज्ञानी कहीं भी भय को प्राप्त नहीं होता | इसप्रकार ओंकार का ज्ञान हो जाने पर मनुष्य कृतार्थ हो जाता है, वह लौकिक पदार्थों के मोहपाश से भी मुक्त हो जाता है |
श्वेताश्वतरोपनिषद्
विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् |
सं बाहुभ्यां धमति संपतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः ||
स्रोत- श्वेताश्वतरोपनिषद्
संकेत-
प्रस्तुत मंत्र श्वेताश्वतरोपनिषद् के तृतीय अध्याय से लिया गया है | मंत्र के द्वारा परमेश्वर से जगत् की सृष्टि
के प्रतिपादन और उनकी विराट रचना के विषय में ध्यानाकर्षण किया गया है |
मंत्रार्थ-
वह परब्रह्म परमेश्वर सब ओर नेत्रोंवाला, सब ओर मुखोंवाला सब ओर भुजाओंवाला और सब ओर पैरोंवाला
है | वह एकमात्र देव प्रकाशमय परमात्मा अंतरिक्षलोक और पृथ्वी की रचना करता हुआ वहां के मनुष्य पक्षी
आदि प्राणियोंको दो भुजाओं और पैरों तथा पंखों से युक्त करता है |
तात्पर्य-
समस्त प्राणियों के चक्षु (नेत्र) परमात्मा के ही हैं | इसीलिए यह विश्वचक्षु है | अतः उनमें अपनी इच्छामात्र से
ही सर्वत्र चक्षु यानी रुपादि को ग्रहण करने का सामर्थ्य है | वह मनुष्यादिको भुजाओं से युक्त करता है और
चलने का साधन यानी पैरों से भी युक्त करता है और यही उन्हें पतन से बचाने वाला भी है | यही एकमात्र
परमेश्वर ने द्युलोक और पृथ्वी की विराट सृष्टि की, तभी उसे जगत रचियता अथवा नियंता भी कहा जाता है |






